
जांच में खुलासा हुआ कि गरीबों को मकान देने के नाम पर बड़ा घोटाला किया गया। 186 लोगों के नाम पर 1-1 लाख रुपए का लोन पास कराया गया, लेकिन जमीन पर एक भी मकान नहीं बना। जब जांच टीम मौके पर पहुंची, तो जिन जगहों पर मकान निर्माण दिखाया गया था, वहां कुछ भी नहीं मिला।
यहां तक कि जिन लोगों के नाम पर लोन लिया गया, वे भी वहां मौजूद नहीं थे। पूरे मामले में फर्जी दस्तावेज तैयार कर लोन लिया गया। मकान निर्माण के फर्जी प्रमाण पत्र भी जारी किए गए और पूरी राशि आपस में बांट ली गई।
दरअसल, साल 1995 से 1998 के बीच शासन की आवासीय योजना के तहत जरूरतमंद लोगों को मकान बनाने के लिए लोन दिया जाना था। गृह निर्माण सहकारी समिति के तत्कालीन अध्यक्ष थावरदास माधवानी और आवास पर्यवेक्षक बसंत कुमार साहू ने अपनी समिति के 186 सदस्यों के नाम पर एक-एक लाख रुपए का लोन मंजूर करवा लिया।
फर्जी दस्तावेजों से लोन पास
इस तरह दोनों ने कुल 1 करोड़ 86 लाख रुपए निकाल लिए गए। रिकॉर्ड में रायपुरा और पंडरीकांचा क्षेत्र में मकान बनना दिखाया गया, लेकिन जांच में वहां न तो मकान मिले और न ही लाभार्थी मौजूद थे। जांच में सामने आया कि इस पूरे मामले में फर्जी दस्तावेज और नकली प्रमाण पत्रों का इस्तेमाल किया गया।
फर्जी प्रमाण पत्र जारी किया
उस समय रायपुर के क्षेत्रीय कार्यालय के अधिकारियों ने बिना सही जांच के लोन आवेदन मंजूर कर आगे भेज दिए, जिसके आधार पर लोन पास हो गया। बाद में निर्माण पूरा होने और लोन उपयोग के भी फर्जी प्रमाण पत्र जारी कर दिए गए। इसमें आवास पर्यवेक्षक की भूमिका भी संदिग्ध पाई गई, जिन्होंने निर्माण पूरा होने का गलत प्रमाण पत्र जारी किया।
नोटिस के बाद भी नहीं हुए पेश
EOW के अनुसार, तत्कालीन अध्यक्ष थावरदास माधवानी और आवास पर्यवेक्षक बसंत कुमार साहू को कई बार नोटिस भेजे गए थे, लेकिन वे पेश नहीं हुए और छिपते रहे। ऐसे में 18 मार्च 2026 को कार्रवाई करते हुए दोनों आरोपियों को अरेस्ट किया और कोर्ट में पेश किया, जहां से आरोपियों को 25 मार्च तक न्यायिक रिमांड पर जेल भेज दिया गया है।
ईओडब्लू का कहना है कि अब ऐसे पुराने लंबित मामलों की भी जांच तेज कर रहा है, ताकि दोषियों पर कार्रवाई की जा सके।