टोक्यो: भारतीय रक्षा मंत्रालय ने संसद को सौंपी एक रिपोर्ट में बताया है कि भारत यूरोपीय देशों के छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमान प्रोग्राम में शामिल होने के लिए बातचीत कर रहा है। इसके बाद जापान के कुछ डिफेंस एक्सपर्ट्स भारत के शामिल होने को लेकर तंज कस रहे हैं तो कई भारत के शामिल होने पर लड़ाकू विमान प्रोग्राम के कई दशकों तक देर होने की आशंका जता रहे हैं। दरअसल यूरोप में अभी तो तरह के छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमान प्रोग्राम हैं। एक FCAS, जिसे फ्रांस, जर्मनी और स्पेन ने शुरू किया था लेकिन जर्मनी से विवाद के बाद फ्रांस इस प्रोग्राम से बाहर आ चुका है।वहीं दूसरा प्रोग्राम GCAP यानि ग्लोबल कॉम्बैट एयर प्रोग्राम है जिसमें ब्रिटेन, इटली और जापान है जो छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमान को डेवलप करने की कोशिश कर रहे हैं। भारत को दोनों ही प्रोग्राम में शामिल होने का कई बार प्रस्ताव दिया गया है और अब भारत ने कहा है कि वो फ्रांस के साथ छठी पीढ़ी का लड़ाकू विमान बनाने में दिलचस्पी रखता है।दूसरी तरफ कुछ जापानी एनालिस्ट 'ग्लोबल कॉम्बैट एयर प्रोग्राम' यानि GCAP में नई दिल्ली को शामिल करने को लेकर चिंता जता रहे हैं। उनकी चिंता इस बात को लेकर है कि ग्रुप का दायरा बढ़ने से फैसले लेने में मुश्किल हो सकती है, डेवलपमेंट में लगने वाला समय बढ़ सकता है और बहुत गोपनीय टेक्नोलॉजी लीक हो सकती है। उनका इशारा भारत और रूस के बीच मजबूत सैन्य संबंध को लेकर है।
GCAP फाइटर जेट प्रोग्राम पर जापानियों की आपत्ति
आईडीआरडब्ल्यू की रिपोर्ट के मुताबिक कुछ जापानी एनालिस्ट काफी भड़काऊ शब्दों का इस्तेमाल कर रहे हैं। उनका कहना है कि भारत के शामिल होने से इस फाइटर जेट को बनाने में दशकों की देरी हो सकती है। एक एक्सपर्ट ने तो यहां तक कहा कि अगर भारत इसमें शामिल होता है तो यह प्रोग्राम '22वीं सदी' तक खिंच सकता है। हालांकि जापानी एक्सपर्ट्स की इन टिप्पणियों को जापानी सरकार की भाषा नहीं समझा जाना चाहिए।जापान, यूके और इटली के GCAP प्रोग्राम के डेवलपमेंट के अगले चरण में पहुंचने के साथ ही नई दिल्ली छठी पीढ़ी के कॉम्बैट एयरक्राफ्ट प्रोग्राम में शामिल होने के विकल्पों पर गंभीरता से विचार कर रही है। साथ ही भारत अपने खुद के 'एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट' (AMCA) प्रोग्राम पर भी काम कर रहा है। ऐसे में किसी इंटरनेशनल छठी पीढ़ी के प्रोग्राम में शामिल होने का सवाल एक बड़ा रणनीतिक फैसला बन गया है।
जापान के नजरिए से देखें तो प्रोग्राम की जटिलता को लेकर उसकी कुछ चिंताएं समझ में आती हैं। जैसे GCAP पहले से ही तकनीकी रूप से एक बहुत बड़ा मल्टीनेशनल प्रोग्राम है जिसमें अलग-अलग इंडस्ट्रियल स्ट्रक्चर, डिफेंस जरूरतों और खरीद प्रक्रियाओं वाले तीन देश शामिल हैं। किसी और बड़े भागीदार को शामिल करने पर काम के बंटवारे, इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी, टेक्नोलॉजी तक पहुंच, एक्सपोर्ट कंट्रोल, सर्टिफिकेशन और इंडस्ट्रियल जिम्मेदारियों को लेकर बातचीत करनी होगी और ये काफी मुश्किल काम है। कोई भी देश टेक्नोलॉजी शेयर नहीं करना चाहता ये हम अच्छी तरह जानते हैं।