गणेश उत्सव आते ही घर-घर में वे कथाएं फिर दोहराई जाने लगती हैं जो बचपन से सुनी हैं। एक बालक है, जिसे माता पार्वती ने द्वार पर बिठाया है। शिवजी आते हैं और बालक उन्हें भीतर जाने से रोक देता है। लोग सोचते हैं कि इसने पिता की अवज्ञा की, पिता के आदेश का पालन नहीं किया, तो पिता ने कुपित होकर बालक का सिर काट दिया। और फिर जब माता ने कहा कि मेरे बालक का सिर आपने कैसे काट दिया, तो जाकर एक हाथी का सिर ले आए और बालक को वह सिर लगा दिया।लोग कहानी को इसी तरह सुनते हैं, और कहानी ऐसी ही है। लेकिन उस कहानी के भीतर गहरे अर्थों के कई तल हैं। इसको अगर ऐसे सोचेंगे कि जैसे आम परिवार होते हैं और उनमें कोई घटना घटती है, तो यह बात अचंभे की लगेगी ही, समझ में नहीं आएगी। पर जब इस बात को गहराई से और वेदांत की दृष्टि से देखेंगे, तो बात एकदम साफ होकर उभरती है। उन अर्थों को जब समझा जाता है, तभी वह कथा हमारे जीवन को समृद्ध कर पाती है, हमें कुछ बोध दे पाती है। नहीं तो हम करते क्या हैं? इतनी सारी बोध-कथाएँ हैं, उनको हम लगभग मनोरंजन जैसा बना लेते हैं। फिर उनसे लाभ नहीं हो पाता।अहंकार और सत्य
कथा की शुरुआत ही इससे होती है कि गणेश जी का जन्म एक अनूठे तरीक़े से हुआ था, जिसमें महादेव की प्रतिभागिता नहीं थी। देवी पार्वती ने सीधे अपने ही शरीर से गणेश जी को जन्म दे दिया था। शिव और शक्ति, शंकर और पार्वती, ये किसके प्रतीक हैं? पार्वती प्रतीक हैं प्रकृति की। प्रकृति यानी यह जो पूरी यांत्रिकता है, भौतिकता है, पार्वती उसका प्रतिनिधित्व करती हैं। और शिव सत्य के प्रतीक हैं। तो चारों तरफ जो गतिशील है, वह प्रकृति है, पार्वती है; और उस पूरी गतिशीलता के केंद्र में जो अचल सत्य है, वह शिव है।यह जो पूरी प्रकृति होती है, इससे जो उत्पन्न होता है, वह होता है अहंकार। देह जन्म लेती है और देह के साथ ही अहंकार जन्म लेता है। जैसे बच्चा पैदा होता है, भौतिक शरीर है, और उसके भीतर अहंकार निर्मित रहता है, शरीर से ही निर्मित रहता है। तो पार्वती से अकेले जन्मे बालक का मतलब यह है कि अभी सत्य का स्पर्श नहीं मिला था। सत्य का स्पर्श मिले बिना ही बालक का जन्म हो गया था।
और अहंकार करता क्या है? सत्य को दरवाजे पर ही रोक लेता है। तो वह जो प्रतीकात्मक कथा हम सुनते हैं कि बाल गणेश ने शिवजी को दरवाजे पर ही रोक दिया, वह किसी बहुत पुरानी सच्चाई की ओर इशारा करती है, कि भौतिक पदार्थ से अहंकार का निर्माण होता है। और यह अहंकार सत्य को पहचानता नहीं है। या यह कह दीजिए कि यह सत्य से ज्यादा वरीयता किसी और को दे देता है, भौतिकता को दे देता है। तो फिर यह सत्य को ही द्वार पर रोकना शुरू कर देता है, सत्य का ही विरोध करना शुरू कर देता है।
अब सामने आते हैं शिव, महादेव। वे क्या कर रहे हैं? वे अहंकार को नष्ट नहीं कर रहे। कथा कहती है कि उन्होंने गणेश जी का सिर काट दिया। पर सिर काट दिया, इसका अर्थ यह नहीं कि नाश कर दिया, समाप्त कर दिया। उन्होंने अहंकार का सिर काटकर दूसरा सिर लगा दिया, ऐसा सिर जिसके साथ बुद्धिमत्ता जुड़ी हुई है। समस्त प्राणी-समुदाय में हाथी को भारतीय परंपरा में बोध का, विवेक का, बुद्धिमत्ता का द्योतक माना गया है। तो अहंकार का जो साधारण सिर था, वह हटा दिया, और वहां बोध का सिर लगा दिया।
यही होता है जब सत्य, यानी शिव, अहंकार को स्पर्श करते हैं। उसका पुराना सिर चला जाता है, उसको नया सिर मिल जाता है। साधारण सिर चला जाता है, और एक ऊंचे पैमाने का, उच्चतर तल का सिर उपलब्ध हो जाता है। सिर का अर्थ भी समझिए। सिर यानी केंद्र। जैसे शरीर का केंद्र सिर होता है, सिर से ही पूरा शरीर संचालित होता है, तो उस केंद्र को हटाकर महादेव ने गणपति को एक नया केंद्र ही दे दिया।
प्रकृति का दिया हुआ जो साधारण सिर था, उसको हटाया, और सत्य का दिया नया सिर लगा दिया। सिर को काटना और नया सिर लगा देना, यह वास्तव में अहंकार के आरोहण की कहानी है। अहंकार एक तल पर था। फिर सत्य का प्रवेश होता है महादेव के रूप में, और वे आकर इस बालक को, जिसे अभी तक सत्य का स्पर्श नहीं मिला है, सत्य का सिर ही प्रदान कर देते हैं। और उसके बाद वह गणेश हो जाता है, गणपति हो जाता है।
हाथी का सिर ही क्यों?
स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि हाथी ही क्यों। शक्तिशाली जानवर तो और भी हैं। शेर के पास ताकत है, बाघ के पास भी बल है। पर वे हिंसक भी हैं। शेर तो फिर भी झुंड में चलता है, बाघ अकेले ही जाकर किसी को भी पकड़ लेता है, चीर-फाड़ देता है। भारत ने दूसरे का नुकसान करने को, दूसरे को चीर-फाड़ देने को कभी बहुत अच्छी बात नहीं माना। इस चीर-फाड़ करने वाले काम को हमने कभी नहीं कहा कि यह बहुत बड़ी बात है। हाथी के पास जो बल है, वह किसी को मारने के काम नहीं आता। जंगल में हाथी ऐसी जगहों से भी रास्ता बना लेता है जहाँ कोई रास्ता होता ही नहीं। हाथी का आकार बाघ, शेर, चीता, इन सबसे बहुत-बहुत बड़ा है, और इतना बड़ा है कि शेर और बाघ भी आमतौर पर हाथी से थोड़ा बचकर ही चलते हैं, कतराते हैं।जबकि हाथी जीवन में कभी किसी का व्यर्थ खून नहीं बहाता। इसकी कोई उत्सुकता हाथी में नहीं है कि किसी की जान जाएगी तब मेरा आकार विशाल होगा। हाथी मांसाहारी नहीं है। लोग कहते हैं कि मांसाहार करो तो प्रोटीन मिलता है और उससे मांसपेशियाँ बनती हैं। तो इतने बड़े हाथी को वह प्रोटीन कहाँ से मिल गया? हाथी किसी को नुकसान दिए बिना ही इतना विशाल आकार और बल रखता है। इसीलिए हाथी को जो विशेष स्थान प्राप्त है, वह शेर या बाघ को नहीं दिया गया। बल है, पर किसी को नुकसान पहुंचाने की वृत्ति नहीं है; बल है, पर साथ में शांति भी है।
इतना ही नहीं। जितने भी वन्य जीव होते हैं, उनमें बुद्धिमत्ता में भी हाथी को परंपरा से ही ऊंचा माना गया है। वैज्ञानिक भी यही कहेंगे कि हाथी की बुद्धिमत्ता इन तमाम मांसाहारी जीवों से ज़्यादा ही होती है। हाथी बेहतर समझ पाता है, बेहतर याद रख पाता है। हाथियों के दलों के सदस्य आपस में ज्यादा बुद्धिमत्तापूर्ण तरीके से संवाद कर पाते हैं। इसलिए हाथी विशेष है।
यह जो सिर लगा है, उसका एक-एक अंग भी कुछ कह रहा है। बड़े कान हैं, वे सुनने के प्रतीक हैं। वे सुन लेते हैं। आँखें छोटी हैं, यह एकाग्रता का प्रतीक है, भीतर तक भेद जाने वाली दृष्टि का। सूँड बल का प्रतीक है, पर ऐसा बल नहीं जो निरंकुश है या हिंसक है। उसी सूँड से वे पेड़ भी उखाड़ सकते हैं, और उसी सूँड से छोटा-सा लड्डू भी उठा सकते हैं। और पेट बड़ा है, लंबोदर हैं। इसका मतलब है कि कुछ भी ऐसा नहीं है जो उनके पाचन से बाहर का है। वे सब पचा लेते हैं।
पर पाचन माने सिर्फ शारीरिक रूप से, भौतिक रूप से पचा लेना नहीं; पचा लेने से अर्थ समझिए, समझ लेना। जैसे कई बार कहा जाता है, जब कोई बात समझ में नहीं आ रही होती, कि यह बात पची नहीं, यह बात कुछ हज़म नहीं हुई। उसी अर्थ में समझ लीजिए कि उनका पाचन शारीरिक नहीं, समझ का पाचन है। समझ पाने की उनकी शक्ति बड़ी जबरदस्त है। ये सब प्रतीक होते हैं, और इनको जब आप सही से समझते हैं, तब जाकर धार्मिकता उतरती है। नहीं तो फिर बस उत्सव है, जिसमें कोई बहुत गहरा अर्थ नहीं रह जाता।
कामनाओं का मूषक
फिर वह वाहन, जिसे देखकर बहुतों को अचरज होता है। गणपति चूहे को मार नहीं रहे हैं, उनकी चूहे से कोई शत्रुता नहीं है। पर चूहा करता क्या है? इधर-उधर भागता रहता है। हर समय इधर कुतर रहा है, उधर कुतर रहा है। जहाँ उसको कुछ मिलना नहीं है, वहाँ भी जाकर वह दाँत चला देता है। ऐसी-ऐसी चीज़ें काट देता है जिनको काटकर उसे कोई लाभ भी नहीं है। आप जाकर देखते हैं कि यह क्या किया? चादर काट गया, कपड़ा काट गया, कोई महंगी चीज थी, कई बार तो जूते कुतर जाता है। खाना रखा हुआ है, वह जाकर पूरा खाना खराब कर देता है। चूहे का आकार अत्यंत छोटा है, अतः उसे भोजन भी बहुत कम चाहिए। लेकिन उसकी वृत्ति यह है कि हर जगह जाकर मुँह मारूँ।तो चूहा कामना का प्रतीक है। कैसी कामना? अंधी कामना, जिसको हर जगह जाकर हर विषय को आजमाना है, और पाना कुछ नहीं है, और भागना दिन भर है। बड़ा मुश्किल होगा कि चूहा आपको कहीं स्थिर बैठा दिख जाए। वह बिल्कुल रेसिंग कार की तरह भागता रहता है। यही भीतरी अहंकारी वृत्ति है: भागते रहो, खाते रहो, भोगते रहो। गणपति का मूषक पर सवार होना बस यह बताता है कि बुद्धिमत्ता कैसे कामना को स्थिर कर देती है, चंचल कामना को शांत कर देती है। जब विवेक आता है, बुद्धिमत्ता आती है, तो आप विनायक हो जाते हैं। और फिर वह कामना-रूपी चूहा आपके सामने एकदम नतमस्तक होकर बैठ जाता है।
चूहे की यह भाग-दौड़ इंद्रियों के रास्ते चलती है, और इंद्रियों का स्वभाव ऐसा है। इंद्रियों का काम है अपने जमे-जमाए संस्कारों पर चलना। बच्चा एकदम छोटा होता है, कुछ दिन का, वह भी अपनी माँ का चेहरा अलग से पहचानता है। पिता का भी नहीं, किसी का नहीं। माँ की गंध भी पहचानता है, शायद आवाज भी। उसको किसी ने सिखाया नहीं। उसको बड़ी माँ ने, यानी मूल प्रकृति ने, पहले ही तैयार करके भेजा है, क्योंकि अगर वह अपनी माँ का चेहरा विशेष रूप से नहीं पहचानेगा, तो हो सकता है कि उसके जीवन में ही बाधा आ जाए। अब वह छोटा बच्चा कहे कि मुझे मेरी माँ से विशेष प्रेम है, तो उससे कहा जाए, "तुझे क्या प्रेम है? तू तो गर्भ से ही इस तरह संस्कारित होकर आया है, इसमें तूने क्या किया?" प्रेम में तो सहमति होती है। प्रेम तो आत्मोत्सर्ग का परिणाम होता है।
तूफान की आवाज एकदम छोटे बच्चे को भी भयानक लगती है, जबकि उसे तूफ़ान का कोई पूर्व अनुभव नहीं है। बड़ी माँ ने सिखाकर भेजा है कि ऐसी हवा चले, ऐसी आवाज़ आए, तो जान का खतरा है। आप किसी खरगोश के पास जाकर सांप जैसी आवाज करके देखिए, क्या होता है। जो जहाँ खेल-कूद रहा होगा, वहीं अपनी जगह पर तुरंत ठिठक जाएगा और कान खड़े कर लेगा। कोई दो महीने का होगा, कोई आठ महीने का, पर इनको पहले ही सिखाकर भेजा गया है कि यह आवाज आई, यानी जान गई।
और वे अपनी एक टांग उठाकर जमीन पर पीटना शुरू कर देते हैं, जैसे सेना में होता है, ठप-ठप-ठप, एकदम लय में। वे पूरे कुनबे को सूचित कर रहे हैं कि आसपास सांप है, सतर्क हो जाओ। मनुष्यों को तो अनुशासन सिखाना पड़ता है कि भूकंप आ رہا हो या आग लग गई हो, तो उस दशा में क्या करना है, और लोगों को कैसे आगाह करना है। और दो महीने का खरगोश भी जानता है कि क्या करना है। यह सोचने की बात है कि उसे यह कैसे ज्ञात होता है।
इसमें पता लगने की कोई बात ही नहीं है। यह प्रोग्रामिंग है। अच्छी है, जीने के लिए अच्छी है, जान बचाती है। पर उससे ज़्यादा इसमें कुछ नहीं है, कुछ भी नहीं। यह प्रोग्रामिंग अनुभव के साथ और गहरी भी होती जाती है। अध्ययनों में पाया गया है कि जो लोग भुखमरी, कुपोषण के दौर से गुजरे होते हैं, उनमें कैलोरी से भरे भोजन की ओर खिंचाव बढ़ जाता है। उसमें बहुत पोषण न हो तो चलेगा, पर उसमें घी हो, तेल हो, कार्बोहाइड्रेट हो। क्योंकि शरीर को पता चल गया है कि खतरा है।
शरीर जान गया है कि हालत ऐसी आ सकती है कि कैलोरी इतनी कम हो जाएं कि चलने-फिरने में भी दिक्कत हो जाए। तो उसने नाक को कुछ सिखा दिया, कि जहाँ कहीं से घी-तेल की गंध आ रही हो, उस ओर विशेष रूप से भागना। कहीं आलू तला जा रहा है, तो नाक उधर बहुत तेजी से जाएगी। दूसरी ओर फलों का रस निकाला जा रहा है, उसमें से भी अच्छी गंध उठती है, पर नाक उधर उतनी नहीं जाएगी। फलों के रस से अच्छे-अच्छे विटामिन मिलते हैं, बिल्कुल मिलते हैं। पर जीने के लिए पहली आवश्यकता विटामिन की नहीं, कैलोरी की है। जब आप बिल्कुल मरने वाले होंगे, तब यही आपको ज़िंदा रखती है। विटामिन भरा हो और शरीर में जलाने को कैलोरी ही न हो, तो क्या करेंगे?