मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच ने अभियोजन विभाग में क्लर्कों को सीधे सहायक जिला लोक अभियोजन अधिकारी (ADPO) बनाने के 10% प्रमोशन कोटे को असंवैधानिक घोषित कर निरस्त कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि क्लास-3 से सीधे क्लास-2 के राजपत्रित पद पर प्रमोशन का यह प्रावधान 'चोर दरवाजे से प्रवेश' जैसा है। ADPO बनने के लिए निर्धारित प्रक्रिया को दरकिनार नहीं किया जा सकता।
जस्टिस जीएस अहलूवालिया और जस्टिस अनुराधा शुक्ला की डिवीजन बेंच ने कहा कि बिना ऑल इंडिया बार परीक्षा पास किए और वकालत का अनुभव लिए क्लर्कों को सीधे अदालत में केस लड़ने की जिम्मेदारी देना उचित नहीं है। सिर्फ LLB की डिग्री होने से कोई कर्मचारी वकील नहीं बन जाता।
पहले से प्रमोट हो चुके कर्मचारियों को राहत
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि याचिका दायर होने से पहले इस 10% कोटे के तहत ADPO बने कर्मचारियों की नौकरी पर फैसले का असर नहीं पड़ेगा। हालांकि, अब इस कोटे से कोई नया प्रमोशन नहीं दिया जा सकेगा।
क्लर्कों के प्रमोशन का अलग रास्ता पहले से तय
कोर्ट ने कहा कि 1998 के नियमों में सहायक ग्रेड-3 के कर्मचारियों के प्रमोशन के लिए सहायक ग्रेड-2, सहायक ग्रेड-1 और अधीक्षक के पदों का रास्ता पहले से निर्धारित है। ये सभी क्लास-3 के पद हैं। ऐसे में एक ही मूल पद से क्लास-3 और सीधे क्लास-2 में प्रमोशन के दो रास्ते नहीं हो सकते।
अदालत ने यह भी कहा कि क्लर्कों के लिए अलग से प्रमोशन का प्रावधान समानता के अधिकार के तहत अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन है।
विभाग ने कोटा खत्म करने की सिफारिश की थी
सुनवाई के दौरान सामने आया कि अभियोजन संचालक ने 4 जुलाई 2019 को राज्य सरकार को पत्र लिखकर इस कोटे को खत्म करने की सिफारिश की थी। पत्र में कहा गया था कि क्लर्क से प्रमोट होकर ADPO बने कर्मचारी अदालती कामकाज और केस की पैरवी में प्रभावी साबित नहीं हो रहे हैं।
2002 में लागू हुआ था 10% प्रमोशन कोटा
याचिकाकर्ताओं के वरिष्ठ अधिवक्ता एमपीएस रघुवंशी के मुताबिक, राज्य सरकार ने 14 अक्टूबर 2002 को लोक अभियोजन भर्ती नियमों में संशोधन किया था।
इसके तहत MPPSC से सीधी भर्ती के लिए निर्धारित ADPO के 100% पदों में से 10% पद सात साल की सेवा और LLB डिग्री वाले क्लर्कों-कर्मचारियों के प्रमोशन के लिए आरक्षित किए गए थे। एडवोकेट रोहन शर्मा और अन्य ने इस संशोधन को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। कोर्ट ने अब इस प्रावधान को निरस्त कर दिया है।
क्लर्क और ADPO के काम में बड़ा अंतर
क्लर्क का काम मुख्य रूप से विभागीय फाइलें, रिकॉर्ड और दस्तावेज संभालना है। वहीं ADPO अदालत में राज्य सरकार की ओर से आपराधिक मामलों की पैरवी करता है। उसे गवाहों से सवाल-जवाब करने, सबूत पेश करने और कानूनी दलीलें रखने की जिम्मेदारी होती है। यानी क्लर्क का काम मुख्य रूप से कार्यालयीन है, जबकि ADPO को अदालत में अभियोजन का पक्ष रखना होता है।